जश्न चल रहा यहाँ वहाँ,लो आता साल नया है
सोच रहीअसमंजस में क्या,सच में कुछ बदला है
फैले है दहशत के लम्हें , आँखो में खून भरा है
अम्मा का संदूक खुला है, प्यार मगर बदला है
दुष्ट खड़ा है सीना ताने,, बेेटी डरी हुई है
काले सिक्को की खन-खन से, सत्य न्याय बदला है
आर्त की चीखों से धरती,हर दिन दहल रही है
तारीकी की चादर ओढ़े, शहर मेरा बदला है
धुंध छंट रही हौले-हौले, ,भोर उजास खिली है
फटी शर्ट-निकर में बच्चे, गाँव कहाँ बदला है
तम को काट रहा है भानु,, प्राची में उतर रहा है
हाय गुम गई मानवताबस, कैलेंडर बदला है
©नयना (आरती) कानिटकर

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